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बंगाल में BJP ने दिखाया ‘आइडियोलॉजिकल पावर’, मोदी-माखनलाल मुलाकात के गहरे मायने

-बंगाल में BJP की ऐतिहासिक एंट्री, मोदी ने श्यामा प्रसाद कार्ड से बढ़ाया सियासी तापमान

 

कोलकाता। नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में पहली भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण समारोह को केवल सत्ता परिवर्तन का आयोजन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे वैचारिक शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक संदेश के विशाल मंच में बदल दिया। समारोह के दौरान प्रधानमंत्री की वरिष्ठ जनसंघ नेता माखनलाल सरकार से हुई मुलाकात ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। भाजपा अब बंगाल की जीत को महज चुनावी सफलता नहीं, बल्कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विचारधारा की “ऐतिहासिक वापसी” के रूप में पेश कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार का गठन डॉ. मुखर्जी के सपनों और राष्ट्रवादी सोच की जीत है। उन्होंने कहा कि “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” का विजन अब बंगाल की धरती पर नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल भावनात्मक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में भाजपा के नए वैचारिक एजेंडे का खुला ऐलान है।

 

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“राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण” की चलेगी राजनीति

दरअसल, भाजपा लंबे समय से बंगाल की राजनीति को “राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण” के फ्रेम में स्थापित करने की कोशिश करती रही है। अब सत्ता में आने के बाद पार्टी उसी नैरेटिव को सरकारी और राजनीतिक दोनों स्तर पर मजबूत करने की तैयारी में दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बार-बार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का उल्लेख करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि बंगाल की राजनीति अब केवल क्षेत्रीय पहचान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसे राष्ट्रीय विचारधारा से जोड़ा जाएगा।

 

दशकों के संघर्ष और कैडर राजनीति से पाई सत्ता

पुराने संगठनात्मक संघर्ष और वैचारिक विरासत को सम्मान देती प्रधानमंत्री मोदी और वरिष्ठ जनसंघ नेता की ऐतिहासिक मुलाकात की तस्वीर

माखनलाल सरकार से मोदी की मुलाकात को भी भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह मुलाकात भाजपा के पुराने संगठनात्मक संघर्ष और वैचारिक विरासत को सम्मान देने का प्रतीकात्मक प्रयास थी। माखनलाल सरकार उन नेताओं में शामिल रहे हैं, जिन्होंने उस दौर में बंगाल में भाजपा का झंडा उठाया, जब राज्य में वामपंथ और बाद में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा था। भाजपा अब यह दिखाने में जुटी है कि उसकी सत्ता कोई अचानक बनी लहर नहीं, बल्कि दशकों के संघर्ष, कैडर राजनीति और वैचारिक लड़ाई का परिणाम है।

 

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बंगाल की बदलेगी राजनीतिक संस्कृति!

राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि भाजपा बंगाल में केवल सरकार चलाने नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति बदलने की तैयारी में है। पार्टी बंगाल में राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता और हिंदुत्व आधारित राजनीति को स्थायी आधार देने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी कारण शपथ ग्रहण समारोह को भी वैचारिक संदेश से भरपूर बनाया गया।

 

“राज्य को ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बना रही भाजपा”

उधर, विपक्ष भाजपा की इस रणनीति को “आक्रामक वैचारिक ध्रुवीकरण” बता रहा है। तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों का आरोप है कि भाजपा बंगाल की पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक राजनीति को बदलकर उसे राष्ट्रीय ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला बनाना चाहती है। विपक्ष का कहना है कि भाजपा बंगाल की क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रवादी राजनीति के जरिए नया रंग देने की कोशिश कर रही है।

 

“ये बंगाल के गौरव और राष्ट्रीय पहचान की वापसी”

हालांकि, भाजपा इसे “बंगाल के गौरव और राष्ट्रीय पहचान की वापसी” बता रही है। पार्टी नेताओं का दावा है कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को वर्षों तक राजनीतिक रूप से दबाया गया और अब भाजपा उसी विचारधारा को बंगाल के केंद्र में लाना चाहती है।

 

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बंगाल की राजनीति में BJP का नया मिशन

फिलहाल, शपथ ग्रहण समारोह में मोदी और माखनलाल सरकार की मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में सिर्फ सत्ता संचालन तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी अब बंगाल की राजनीति में वैचारिक रूप से लंबी और निर्णायक पारी खेलने की तैयारी में उतर चुकी है।

 

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