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93 करोड़ की दवा योजना पर सवाल! राजस्थान में बिना फार्मासिस्ट चल रहे हजारों पशु चिकित्सा केंद्र

जयपुर। राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री पशुधन निःशुल्क दवा योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। करोड़ों रुपये के बजट से संचालित इस योजना को लेकर राजस्थान फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने गंभीर आरोप लगाए हैं। संगठन का दावा है कि राज्यभर में संचालित अधिकांश पशु चिकित्सा संस्थानों और दवा वितरण केंद्रों पर पंजीकृत फार्मासिस्टों की नियुक्ति नहीं है, जबकि करोड़ों रुपये की दवाओं का भंडारण और वितरण लगातार किया जा रहा है। फार्मासिस्ट एसोसिएशन का कहना है कि प्रशिक्षित और पंजीकृत फार्मासिस्टों के अभाव में दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षित भंडारण और पशुओं के उपचार की प्रभावशीलता प्रभावित होने का खतरा बना हुआ है। संगठन ने सरकार से तत्काल फार्मासिस्ट पद सृजित कर नियमित नियुक्तियां करने की मांग की है।

 

93 करोड़ से ज्यादा का बजट, लेकिन फार्मासिस्ट नहीं

राजस्थान फार्मासिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. प्रवीण कुमार सेन ने कहा कि वर्ष 2012 से मुख्यमंत्री पशुधन निःशुल्क दवा योजना के तहत पशुपालकों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने वर्षों बाद भी पशुपालन विभाग में फार्मासिस्टों के पद सृजित नहीं किए गए। उन्होंने कहा कि दवाओं का रखरखाव, भंडारण, स्टॉक प्रबंधन और वितरण अत्यंत तकनीकी कार्य हैं, जिन्हें प्रशिक्षित फार्मासिस्टों की देखरेख में किया जाना चाहिए। वर्तमान में कई स्थानों पर यह जिम्मेदारी ऐसे कर्मचारियों द्वारा निभाई जा रही है जिन्हें दवा प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण नहीं है।

 

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10,837 संस्थानों के जरिए बांटी जा रही हैं दवाएं

एसोसिएशन के जयपुर संभाग अध्यक्ष ओमप्रकाश मीणा ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में मुख्यमंत्री पशुधन निःशुल्क दवा योजना पर करीब 93.54 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2024 तक राजस्थान में कुल 10,837 पशु चिकित्सा संस्थान संचालित थे। इनमें—

73 पॉलीक्लिनिक
857 प्रथम श्रेणी पशु चिकित्सालय
2,240 पशु चिकित्सालय
7,565 पशु चिकित्सा उपकेंद्र
102 मोबाइल वेटरिनरी यूनिट

शामिल हैं। इन संस्थानों के माध्यम से राज्यभर के लाखों पशुपालकों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

 

दवा वितरण नहीं, पूरा वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी

फार्मासिस्ट एसोसिएशन का कहना है कि दवा प्रबंधन केवल दवाइयां बांटने तक सीमित नहीं होता। इसके लिए वैज्ञानिक मानकों का पालन करना अनिवार्य है। विशेषज्ञों के अनुसार दवाओं के सुरक्षित उपयोग के लिए:

तापमान नियंत्रण
आर्द्रता प्रबंधन
एक्सपायरी डेट की निगरानी
स्टॉक रोटेशन
गुणवत्ता संरक्षण
दवा की उचित मात्रा का निर्धारण
संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी

जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक होता है। यदि इनमें किसी प्रकार की लापरवाही होती है तो दवा की प्रभावशीलता कम हो सकती है और उपचार प्रभावित हो सकता है।

 

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सरकार का बड़ा लक्ष्य, लेकिन व्यवस्था पर सवाल

वर्ष 2026-27 के आउटपुट-आउटकम बजट दस्तावेज के अनुसार राज्य सरकार ने इस योजना के तहत लगभग 200 प्रकार की दवाइयां और 25 प्रकार की सर्जिकल सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया है। इसके साथ ही सरकार ने लगभग 5 करोड़ पशुओं के उपचार करीब 1.40 करोड़ पशुपालकों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। इतने बड़े स्तर पर संचालित योजना में फार्मासिस्टों की अनुपस्थिति को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं।

 

सरकार से क्या है मांग?

राजस्थान फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने मांग की है कि पशुपालन विभाग के अंतर्गत संचालित सभी औषधि भंडारों और दवा वितरण केंद्रों पर पंजीकृत फार्मासिस्टों के पद सृजित किए जाएं और नियमित नियुक्तियां की जाएं। संगठन का कहना है कि इससे न केवल दवा वितरण व्यवस्था अधिक पारदर्शी और वैज्ञानिक बनेगी, बल्कि पशुओं को गुणवत्तापूर्ण उपचार भी सुनिश्चित हो सकेगा।

 

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अब सरकार के सामने बड़ा सवाल

प्रदेश में करोड़ों रुपये की लागत से संचालित इस महत्वाकांक्षी योजना का लाभ लाखों पशुपालकों और करोड़ों पशुओं तक पहुंच रहा है। ऐसे में फार्मासिस्ट एसोसिएशन द्वारा उठाए गए सवालों ने योजना की व्यवस्थाओं पर नई बहस छेड़ दी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि राज्य सरकार और पशुपालन विभाग इन आरोपों को किस तरह देखते हैं और क्या पशु चिकित्सा संस्थानों में फार्मासिस्टों की नियुक्ति को लेकर कोई ठोस निर्णय लिया जाता है।

 

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