जयपुर। आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती देने और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए राजस्थान सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। अब सरकारी विभागों द्वारा की जाने वाली खरीद में देश में निर्मित यानी ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों और सेवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। इस संबंध में राज्य सरकार ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय उत्पादकों को टेंडर प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए अनुचित शर्तें लगाने वाले अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। राज्य सरकार ने इस वर्ष के बजट में घोषणा की थी कि सरकारी खरीद नीति को आत्मनिर्भर भारत अभियान के अनुरूप बनाया जाएगा। इसी घोषणा को अमलीजामा पहनाते हुए अब नई खरीद नीति लागू की गई है, जिसके तहत स्थानीय उत्पादकों और सेवा प्रदाताओं को सरकारी टेंडरों में समान अवसर सुनिश्चित किए जाएंगे।
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स्थानीय उत्पादों को मिलेगी प्राथमिकता
नई व्यवस्था के अनुसार ऐसे उत्पाद स्थानीय माने जाएंगे जिनमें कम से कम 50 प्रतिशत सामग्री भारत में निर्मित या स्थानीय स्रोतों से प्राप्त की गई हो। सरकार का मानना है कि इससे प्रदेश और देश के छोटे एवं मध्यम उद्योगों को नई ऊर्जा मिलेगी तथा रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। सरकार ने यह भी तय किया है कि स्थानीय उत्पादकों से खरीदे जाने वाले सामान में से कम से कम 4 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों द्वारा निर्मित उत्पादों का होगा। इससे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को भी सरकारी खरीद प्रणाली में भागीदारी का अवसर मिलेगा।
टेंडर में नहीं लगेंगी भेदभावपूर्ण शर्तें
आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि सरकारी विभाग टेंडर प्रक्रिया में ऐसी कोई शर्त नहीं लगाएंगे जिससे स्थानीय उत्पादक या सेवा प्रदाता बाहर हो जाएं। टर्नओवर, उत्पादन क्षमता और वित्तीय योग्यता जैसी शर्तों को इस प्रकार निर्धारित किया जाएगा कि स्थानीय उद्योग भी उन्हें पूरा कर सकें। इसके अलावा विदेशी प्रमाणपत्रों की अनिवार्यता, किसी विशेष ब्रांड या मॉडल का उल्लेख, अनावश्यक तकनीकी विशिष्टताएं तथा स्थानीय उत्पादकों के प्रति भेदभावपूर्ण शर्तें लगाने पर भी रोक लगा दी गई है। सरकार का उद्देश्य है कि स्थानीय उद्योगों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का अवसर मिल सके।
फर्जी दावों पर दो साल का प्रतिबंध
सरकारी खरीद में भाग लेने वाले स्थानीय उत्पादकों को यह शपथ पत्र देना होगा कि उनका उत्पाद वास्तव में स्थानीय श्रेणी में आता है। दस करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के टेंडरों में भाग लेने वाले उत्पादकों को चार्टर्ड अकाउंटेंट या कॉस्ट अकाउंटेंट का प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत करना होगा। सरकारी विभाग इन दस्तावेजों की जांच करेंगे और यदि किसी उत्पादक द्वारा गलत जानकारी देने या फर्जी दावा करने का मामला सामने आता है तो उसे दो वर्षों तक सरकारी खरीद प्रक्रिया से बाहर किया जा सकेगा।
री-पैकिंग और रीसेल को नहीं मिलेगा लाभ
नई नीति के तहत केवल नाम मात्र की स्थानीय गतिविधियों को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि बाहर से तैयार माल लाकर केवल उसकी री-पैकिंग करना, पुनर्विक्रय करना या पुराने उत्पादों को मरम्मत कर दोबारा बेचना स्थानीय उत्पादन नहीं माना जाएगा। ऐसे उत्पाद इस नीति के लाभ के पात्र नहीं होंगे।
छोटे खरीद मामलों को दी गई छूट
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पांच लाख रुपये से कम मूल्य की सरकारी खरीद पर ये नियम लागू नहीं होंगे। यानी छोटे स्तर की खरीद प्रक्रिया को इस नीति के दायरे से बाहर रखा गया है।
स्थानीय उद्योगों के लिए नई उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि नई खरीद नीति से राजस्थान के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बड़ा लाभ मिलेगा। सरकारी खरीद में स्थानीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ने से उत्पादन, निवेश और रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी। साथ ही आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी जमीनी स्तर पर मजबूती मिलेगी। सरकार के इस फैसले को स्थानीय उद्योगों के लिए बड़ी राहत और विदेशी निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।






