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कचरे के नारियल से तैयार किए हजारों ‘घोंसले’, बेजुबान पक्षियों को दिया नया बसेरा

-50 डिग्री की तपिश में मूक प्राणियों के ‘जीवनदूत’ बने जयपुर के युवा

 

जयपुर। दोपहर की झुलसा देने वाली गर्मी…सूखे पेड़…और प्यास से तड़पते बेजुबान पक्षी। डिग्गी मालपुरा रोड स्थित रातल्या गांव में यही मंजर हर साल देखा जाता था। लेकिन इस बार कुछ युवाओं ने हालात बदलने की ठानी, और कचरे में फेंके गए नारियल के खोलों में ‘उम्मीद’ बुन दी। पर्यावरण प्रेमी दिनेश रातल्या और राजूलाल चेला अचरावाला जब सड़क किनारे पड़े नारियल के खोल उठाते हैं, तो वे सिर्फ कचरा नहीं समेटते- वे उन नन्हीं जिंदगियों के लिए आशियाना तैयार करते हैं, जिनकी आवाज हम अक्सर सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं। बड़ी बारीकी से इन खोलों में छेद किया जाता है, रस्सी पिरोई जाती है और फिर इन्हें पेड़ों पर टांग दिया जाता है। कुछ ही देर में यही बेकार खोल गौरैया और अन्य छोटे पक्षियों के लिए सुरक्षित घर बन जाते हैं। गांव के एक बुजुर्ग बताते हैं, “पहले गर्मी में पेड़ों पर सन्नाटा छा जाता था…अब सुबह होते ही चहचहाहट लौट आई है।” यह बदलाव सिर्फ घोंसलों का नहीं, सोच का भी है।

 

गर्मी में ‘ठंडा बसेरा’

नारियल के खोल से बने ये घोंसले प्लास्टिक या लोहे के बर्तनों की तुलना में कहीं अधिक ठंडे रहते हैं। 50 डिग्री सेल्सियस तक की तपिश में भी ये पक्षियों को लू से बचाते हैं। मजबूत बाहरी आवरण इन्हें आंधी-तूफान में भी सुरक्षित बनाए रखता है।

 

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हर दिन बन रहे 100+ घोंसले

समाजसेवी दिनेश बागड़ा के अनुसार, हर रात 100 से अधिक घोंसले तैयार किए जा रहे हैं। अब यह पहल पूरे इलाके में एक अभियान का रूप ले चुकी है। अब आसपास के ग्रामीण भी इस अभियान से जुड़ते जा रहे हैं। लक्ष्य है-करीब 2100 घोंसले तैयार कर गांव-गांव, घर-घर पहुंचाना। इतना ही नहीं, टीम ने खाली पड़े जलाशयों को पानी से भरने का भी संकल्प लिया है, ताकि पक्षियों को पीने का पानी मिल सके और वे इस भीषण गर्मी में अपनी प्यास बुझा सकें।

 

पौधारोपण से बढ़ाई हरियाली

रातल्या गांव के गुरूमहाराज मंदिर परिसर में पक्षियों के लिए परिंडे लगाए गए, नारियल के घोंसले टांगे गए और गुलर के 11 पौधे भी रोपे गए। इस मौके पर लालचंद शर्मा, शुभम लोदवाल, नीरज मेहता और रघुनाथ धनवंता सहित कई ग्रामीण और महिलाएं मौजूद रहीं। रातल्या के युवाओं ने दिखा दिया कि बदलाव के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि संवेदनशील दिल और छोटी-सी पहल की जरूरत होती है। जहां लोग कचरा देखते हैं, वहीं ये युवा ‘जीवन’ देख रहे हैं।

 

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