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“इतिहास स्टेशन पर खड़ा, सिस्टम सोता रहा!”, बांदीकुई में स्टीम इंजन लोकार्पण को तरसा

– रेल नगरी का गौरव धूल फांक रहा, दो महीने से उद्घाटन का इंतजार, लोगों में नाराजगी

 

बांदीकुई। रेल नगरी के रूप में अपनी अलग पहचान रखने वाला बांदीकुई एक बार फिर इतिहास की खुशबू से सराबोर हो रहा है। करीब 33 साल बाद भाप से चलने वाले स्टीम इंजन की झलक शहर में देखने को मिली है। लेकिन अफसोस…यह ऐतिहासिक धरोहर आज भी लोकार्पण का इंतजार कर रही है। रेलवे की ओर से विरासत को संजोने के उद्देश्य से चेन्नई की गोल्डन रॉक वर्कशॉप में तैयार किया गया ‘बी क्लास’ नैरो गेज स्टीम इंजन मॉडल बांदीकुई जंक्शन पर स्थापित तो कर दिया गया है, मगर पिछले दो महीनों से यह इंजन तिरपाल में ढका हुआ धूल फांक रहा है। स्टेशन के बाहर जीआरपी थाने के पास रखा यह मॉडल अब लोगों की उत्सुकता से ज्यादा सवाल खड़े कर रहा है।

 

इतिहास से जुड़ी है बांदीकुई की पहचान

बांदीकुई का रेल इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। वर्ष 1874 में आगरा फोर्ट से यहां तक प्रदेश की पहली पैसेंजर ट्रेन चली थी। उस दौर में भाप के इंजन ही परिवहन की रीढ़ थे और बांदीकुई इस सफर का अहम पड़ाव। ऐसे में यह स्टीम इंजन केवल एक मॉडल नहीं, बल्कि शहर के सुनहरे अतीत की जीवंत झलक है।

 

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आ गया इंजन… लेकिन लोकार्पण कब?

स्थानीय विधायक भागचंद टांकड़ा की पहल पर यह इंजन विशेष तैयारियों के साथ चेन्नई से मंगवाया गया। योजना थी कि इसे आकर्षक तरीके से स्थापित कर शहर का गौरव बढ़ाया जाए और पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बनाया जाए। लेकिन हकीकत यह है कि दो महीने बीतने के बावजूद इसका उद्घाटन नहीं हो पाया है। तिरपाल में ढका यह इंजन अब लोगों की नाराजगी का कारण बनता जा रहा है।

 

बन सकता है शहर का नया ‘सेल्फी स्पॉट’

अगर इस ऐतिहासिक इंजन को लाइटिंग, सूचना पट्ट और आकर्षक डिजाइन के साथ विकसित किया जाए, तो यह बांदीकुई का नया पहचान चिन्ह बन सकता है। न सिर्फ स्थानीय लोग, बल्कि यहां आने वाले यात्री भी शहर के गौरवशाली इतिहास से जुड़ सकेंगे।

 

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अब सबकी नजरें प्रशासन पर

सबसे बड़ा सवाल यही है-आखिर कब हटेगा तिरपाल और कब मिलेगा इस ऐतिहासिक धरोहर को उसका सम्मान? बांदीकुई के लोग बेसब्री से उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब यह इंजन सिर्फ धूल नहीं, बल्कि शहर का गौरव बनकर चमकेगा।

 

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