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सांगानेर में जहर का खेल: कागजों में दौड़ रहा 123 करोड़ का प्लांट, मोटर से नेवटा फीडर में उड़ेला जा रहा है मौत का पानी

– चैंबर के अंदर छिपी शातिर चालबाजी: प्लांट बंद, मोटरों के जरिए सीधे नेवटा फीडर में उतारा जा रहा है कैमिकल का जहर

 

जयपुर। राजधानी के ऐतिहासिक और हस्तशिल्प के लिए पूरी दुनिया में पहचान रखने वाले सांगानेर क्षेत्र में इन दिनों पर्यावरण विरोधी ताकतों का खुला खेल चल रहा है। यहां चारों तरफ कुकुरमुत्ते की तरह उगी रंगाई-छपाई (डाइंग एंड प्रिंटिंग) फैक्ट्रियों का कैमिकलयुक्त जहरीला पानी धड़ल्ले से आम रास्तों, हरे-भरे खेत-खलिहानों, मुहाना सागर और जीवनदायिनी माने जाने वाली नेवटा नहर तक में बेरोकटोक छोड़ा जा रहा है। इस खतरनाक जहर ने जहां एक ओर उपजाऊ खेतों को बंजर बना दिया है और प्राकृतिक जलस्रोतों को जहरीला कर दिया है, वहीं पेट पालने के लिए अन्नदाता कहलाने वाला किसान मजबूरन मजदूर बनने की दास्तां लिखने को विवश हो गया है। लेकिन, इन सबके बीच सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यह है कि इस रासायनिक पानी को ट्रीट करने के लिए सांगानेर में पीपीपी (PPP) मॉडल पर 123 करोड़ रुपए की लागत से अत्याधुनिक सीईटीपी (CETP) प्लांट पहले से ही स्थापित है। इसके बावजूद यदि जहरीला पानी सीधे खेतों, रास्तों और जलस्रोतों को तबाह कर रहा है, तो आखिर इस भ्रष्टाचार और लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? इस बारे में जानने के लिए डेमोक्रेटिक भारत ने राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल के जयपुर (दक्षिण) क्षेत्रीय अधिकारी विवेक गोयल और एसईपीडी डायरेक्टर प्रवीण शाह को कई बार फोन किया, लेकिन इन्होंने रिसीव नहीं किया। जहर के इस पूरे साम्राज्य की कलई खोलती डेमोक्रेटिक भारत की एक्सक्लूसिव खबर।

 

 

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एसईपीडी मैनेजमेंट की बड़ी कारस्तानी: प्लांट सिर्फ शो-पीस, हकीकत में हो रहा जनजीवन से खिलवाड़

 

 

डेमोक्रेटिक भारत की खोजी पत्रकारिता और तथ्यों के आधार पर यह खुलासा हुआ है कि इस गंभीर पर्यावरण संकट के पीछे किसी आम फैक्ट्री मालिक का नहीं, बल्कि खुद एसईपीडी (SEPD) मैनेजमेंट का काला खेल चल रहा है। एसईपीडी मैनेजमेंट न केवल सीईटीपी प्लांट को ठीक से संचालित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है, बल्कि अपनी अवैध फैक्ट्रियों को बचाने के लिए आम जनता के जीवन से सीधे खिलवाड़ करते हुए भजनलाल सरकार को भी गुमराह कर रहा है। स्थानीय लोगों ने कई बार इस बात की शिकायत सीईटीपी डायरेक्टर प्रवीण शाह से की, लेकिन वे हर बार इस सच्चाई को सिरे से नकारते रहे। आम लोगों के पास पुख्ता सबूत न होने के कारण वे हर बार मन मसोस कर रह जाते थे। लेकिन अब मीडिया रिपोर्ट्स और साक्ष्यों ने एसईपीडी डायरेक्टर के हर एक झूठ की परतें उधेड़कर रख दी हैं।

 

 

चैंबर के अंदर छिपी है मोटर, आखिर किसकी चालबाजी?

 

मौके पर किए गए खुलासे से यह साबित हो गया है कि करोड़ों रुपए का सीईटीपी प्लांट केवल ‘शो-पीस’ बनकर रह गया है। सीईटीपी प्लांट के ठीक सामने बने चैंबर से कैमिकल वाला जहरीला पानी बिना ट्रीट किए सीधे नेवटा फीडर में उड़ेला जा रहा है। इस अवैध कृत्य को किसी की नजरों में आने से बचाने के लिए चैंबर के अंदर ही मोटर लगा रखी है और उसे इस शातिर तरीके से ढंका गया है कि पहली नजर में कोई इसे पकड़ न सके। यानी, कागजों में सीईटीपी का संचालन भारी भरकम दावों के साथ दिखाया जा रहा है, जबकि हकीकत में प्लांट ठप पड़ा है। यह पूरी कारस्तानी एसईपीडी डायरेक्टर प्रवीण शाह की सीधी शह और मिलीभगत के बिना संभव ही नहीं है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या राजस्थान पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (RPCB), जो कई बार इस प्लांट का निरीक्षण कर चुका है, उसे यह खुली धांधली कभी दिखाई नहीं दी या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

SEPD मैनेजमेंट की पूरी कारस्तानी देखने के लिए क्लिक करें 👇

यह भी देखें: सांगानेर में जहर का खुला खेल: 5 छोटी मछलियों पर शिकंजा, ‘मगरमच्छों’ पर बोर्ड क्यों मेहरबान?

 

 

 

गणित समझिए: 31 एमएलडी जहरीला पानी रोज बन रहा जनता के लिए नासूर

 

 

सांगानेर में सीईटीपी के सामने से निकलकर यह जहरीला पानी नेवटा फीडर में इस नाले के जरिए बहता जाता है।
सांगानेर में सीईटीपी के सामने से निकलकर यह जहरीला पानी नेवटा फीडर में इस नाले के जरिए बहता जाता है।

सांगानेर में कुल करीब 4500 फैक्ट्रियां हैं, जिनमें से महज 758 फैक्ट्रियां ही आधिकारिक तौर पर सीईटीपी से जुड़ी हैं। बाकी तमाम फैक्ट्रियां अवैध हैं। बोर्ड और एसईपीडी के अपने आंकड़ों के मुताबिक, इन सभी अवैध फैक्ट्रियों के जहरीले पानी को संभालने के लिए सांगानेर में कम से कम 20 एमएलडी क्षमता का एक और सीईटीपी प्लांट और जोड़ना होगा, जिससे कुल क्षमता करीब 32.3 एमएलडी हो सके। मौजूदा हालात यह हैं कि 12.3 एमएलडी वाला इकलौता प्लांट भी 1-2 एमएलडी पर घिसट रहा है। नतीजतन, रोजाना लगभग 31 एमएलडी जहरीला रसायन नेवटा फीडर, मुहाना सागर और किसानों के खेतों में मोटरों के जरिए खुलेआम छोड़ा जा रहा है, यह जहर हवा, जमीन और पानी तीनों को दूषित कर खाद्य शृंखला के जरिए सीधे इंसानी शरीर और फसलों में पहुंच रहा है।

 

 

 

बिजली खपत के आंकड़ों ने खोल दी पोल: 35 हजार यूनिट की जरूरत, जल रहा महज नाममात्र

 

सीईटीपी के प्लांट के सामने से नेवटा फीडर में छोड़े जाने वाला जहरीला पानी खेतों में भी जाता है और भूमि को बंजर बना रहा है।
सीईटीपी के प्लांट के सामने से नेवटा फीडर में छोड़े जाने वाला जहरीला पानी खेतों में भी जाता है और भूमि को बंजर बना रहा है।

फैक्ट्रियों के जहरीले पानी को साफ करने के लिए सांगानेर में बने सीईटीपी प्लांट की डिजाइन क्षमता 12.3 एमएलडी (MLD) है। लेकिन वर्तमान में यह मात्र 1 से 2 एमएलडी पर ही दम तोड़ रहा है। पॉल्यूशन बोर्ड ने भी अपनी रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की है। 8 मई 2026 को जेडीए, जेवीवीएनएल और पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों की संयुक्त टीम ने प्लांट का निरीक्षण किया था। लोड सर्वे में यह बात सामने आई कि सीईटीपी को उसकी डिजाइन क्षमता के अनुसार आरओ-II (RO-II) स्टेज तक सुचारू चलाने के लिए रोजाना लगभग 35,810.7 किलोवाट-घंटे (kWh) यानी महीने में लगभग 10.74 लाख kWh बिजली की आवश्यकता है। इसके विपरीत, जेवीवीएनएल द्वारा जारी पिछले 6 महीनों के औसत बिजली खपत के आंकड़े सिर्फ 1.24 लाख kWh प्रति माह रहे हैं। यह खुला आंकड़ा इस बात का अकाट्य सबूत है कि प्लांट अपनी क्षमता का 10% भी संचालित नहीं हो रहा है, बल्कि सिर्फ कागजों में ही इसका संचालन दिखाया जा रहा है।

 

सीईटीपी से छोड़े जाने वाला जहरीला पानी नेवटा फीडर में जरिए नेवटा बांध में पहुंचकर प्राकृतिक जलस्रोतों को प्रदूषित कर रहा है।
सीईटीपी से छोड़े जाने वाला जहरीला पानी नेवटा फीडर में जरिए नेवटा बांध में पहुंचकर प्राकृतिक जलस्रोतों को प्रदूषित कर रहा है।

यह भी देखें: सांगानेर में ‘टॉक्सिक’ खेल का पर्दाफाश: SEPD का भ्रमजाल ध्वस्त, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ठोंका ₹20.16 लाख का जुर्माना

 

 

कानून के लंबे हाथ: क्या अब होगी बुलडोजर कार्रवाई?

 

देश में पर्यावरण और जल स्रोतों को बचाने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान मौजूद हैं:

 

जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974:  इसके तहत बिना अनुमति या बिना मानकों के किसी भी उद्योग का रासायनिक अपशिष्ट सीधे प्राकृतिक जलस्रोतों में डालना दंडनीय अपराध है। ऐसा करने पर 3 से 6 साल तक की कैद और भारी जुर्माने का प्रावधान है। राजस्थान राज्य प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के पास यह पूरा अधिकार है कि वे दोषी इकाइयों के खिलाफ आपातकालीन कार्रवाई करते हुए उनके पानी-बिजली के कनेक्शन तुरंत काटें और ताले लगाएं।

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: यह कानून पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने और खतरनाक रसायनों के निष्कासन पर सख्त रोक लगाता है। इसका उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर कारावास और आर्थिक दंड तय किया गया है।

अब वक्त आ गया है कि राजस्थान पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड और जिला प्रशासन बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के इन ‘जहर के सौदागरों’ के खिलाफ सख्त रुख अपनाए। जनता की सेहत और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने वाले इन जिम्मेदारों पर अब बुलडोजर एक्शन और आपराधिक मुकदमे ही एकमात्र न्याय हैं। क्या प्रशासन अब भी कुंभकर्णी नींद में सोता रहेगा या इन रसूखदार भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसेगी?

 

ऐसी ही खबरों के लिए देखें: https://democraticbharat.com/

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