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134 अवैध फैक्ट्रियों पर मेहरबानी या जनता से खिलवाड़? टैंकरों का झूठा ढकोसला और कागजी फरमानों की खुली पोल

– गंवार ब्राह्मणान में 134 फैक्ट्रियों पर मेहरबानी, जहरीले पानी के निस्तारण का इंतजाम अब भी सवालों के घेरे में; टैंकरों से CETP तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

– SEPD मैनेजमेंट ने 134 फैक्ट्रियों को रोटेशनल क्लोजर प्लान के एरिया नंबर-2 में किया शामिल, लेकिन CETP से जुड़ाव नहीं होने के बावजूद पानी के निस्तारण का व्यावहारिक समाधान क्या है?
डायरेक्टर प्रवीण शाह ने कहा-नियम-कायदे प्रदूषण नियंत्रण मंडल से पूछने पड़ेंगे; फिर मैनेजमेंट ने अपने स्तर पर दिशा-निर्देश कैसे जारी कर दिए?

 

जयपुर। सांगानेर पंचायत समिति के गंवार ब्राह्मणान गांव में रंगाई-छपाई फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले पानी का मामला एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। गांव में करीब 300 रंगाई-छपाई फैक्ट्रियां संचालित होने की बात सामने आई है। इनमें से लगभग 134 फैक्ट्रियां SEPD की सदस्य बताई जा रही हैं, लेकिन वे मुख्य कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) से जुड़ी हुई नहीं हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषित पानी का वास्तविक और प्रभावी निस्तारण आखिर होगा कैसे? डेमोक्रेटिक भारत की पड़ताल में सामने आए तथ्यों के मुताबिक, इन फैक्ट्रियों को लेकर प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ओर से बंदी के नोटिस जारी किए गए थे। इसके बाद दीपावली के त्योहार को देखते हुए राहत दिए जाने की बात सामने आई। बताया जा रहा है कि प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने कुछ शर्तों के साथ अस्थायी रूप से कामकाज की मौखिक अनुमति दी है। हालांकि, इस अनुमति की औपचारिक शर्तें, उनका लिखित स्वरूप और निगरानी की व्यवस्था सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना जरूरी है। यह जानने के लिए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सदस्य सचिव कपिल चन्द्रावल को कई बार कॉल किया गया, लेकिन, उन्होंने रिसीव नहीं किया। इधर, SEPD मैनेजमेंट ने गंवार ब्राह्मणान की इन 134 फैक्ट्रियों को रोटेशनल क्लोजर प्लान के एरिया नंबर-2 में शामिल कर लिया है। मैनेजमेंट की ओर से जारी दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि रोटेशनल क्लोजर प्लान लागू रहने तक सदस्य इकाइयों को अपशिष्ट पानी का ETP में ट्रीटमेंट करने के बाद उसे CETP प्लांट तक पहुंचाना होगा। कागजों पर यह व्यवस्था प्रदूषण रोकने की दिशा में उठाया गया कदम नजर आती है, लेकिन जमीन पर इसे लागू करने की व्यवस्था ही सबसे बड़ा सवाल बन गई है।

 

 

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134 फैक्ट्रियां, लेकिन जहरीला पानी ले जाने के लिए टैंकर कहां से आएंगे?

 

गंवार ब्राह्मणान की 134 फैक्ट्रियां जब मुख्य CETP प्लांट से जुड़ी ही नहीं हैं, तो उनके अपशिष्ट पानी को प्लांट तक पहुंचाने के लिए टैंकरों पर निर्भरता की बात सामने आ रही है। यहां सवाल केवल पानी को टैंकर में भरकर ले जाने का नहीं, बल्कि रोजाना निकलने वाले प्रदूषित पानी की पूरी मात्रा को समय पर उठाने, सुरक्षित तरीके से परिवहन करने और उसका अंतिम निस्तारण सुनिश्चित करने का है। गांव में संचालित एक फैक्ट्री के सदस्य संचालक ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि कुछ लोगों ने टैंकर भेजने शुरू किए हैं, लेकिन अभी पर्याप्त संख्या में टैंकर उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जहरीला पानी भरकर ले जाने से कई टैंकर मालिक मना करते हैं, क्योंकि उन्हें अपने टैंकरों को नुकसान पहुंचने का डर रहता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पर्याप्त टैंकर ही उपलब्ध नहीं हैं, तब 134 फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट पानी का पूरा उठाव कैसे होगा? क्या प्रत्येक फैक्ट्री के लिए प्रतिदिन पानी उठाने की व्यवस्था निर्धारित की गई है? क्या टैंकरों की संख्या, उनकी क्षमता और आवाजाही का रिकॉर्ड तैयार किया गया है? और क्या किसी एजेंसी को यह जिम्मेदारी दी गई है कि एक बूंद भी अनुपचारित पानी खेतों, आम रास्तों या जल निकासी मार्गों में नहीं पहुंचे? इन सवालों के स्पष्ट जवाब के बिना केवल टैंकरों के जरिए पानी CETP तक पहुंचाने का निर्देश प्रदूषण नियंत्रण की ठोस व्यवस्था साबित नहीं हो सकता।

 

CETP तक पानी पहुंच भी गया तो क्या उसका निस्तारण सुनिश्चित है?

 

मामले का दूसरा गंभीर पहलू CETP प्लांट की कथित कार्यप्रणाली से जुड़ा है। आरोप है कि प्लांट से जुड़े कुछ चैंबरों के जरिए मोटर लगाकर प्रदूषित पानी चोरी-छिपे नेवटा फीडर की ओर छोड़ा जा रहा है। फिर यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि गंवार ब्राह्मणान की फैक्ट्रियों का पानी टैंकरों से CETP तक पहुंचाने के बाद उसका अंतिम निस्तारण किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा। आखिर पानी को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर पहुंचा देना ही प्रदूषण नियंत्रण नहीं है। असली कसौटी यह है कि पानी का निर्धारित मानकों के अनुरूप उपचार हो और उसके बाद उसका निस्तारण पर्यावरणीय नियमों के अनुसार किया जाए। यदि टैंकरों से लाया गया पानी भी अंततः खुले रास्तों, फीडर या अन्य जल निकासी मार्गों में छोड़ा जाता है, तो पूरी व्यवस्था का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण मंडल और SEPD मैनेजमेंट को स्पष्ट करना चाहिए कि इन 134 फैक्ट्रियों के पानी की मात्रा का आकलन कैसे किया गया है, CETP की उपलब्ध क्षमता कितनी है, टैंकरों से आने वाले पानी की एंट्री और ट्रीटमेंट का रिकॉर्ड कैसे रखा जाएगा तथा यह सुनिश्चित करने के लिए क्या निगरानी होगी कि प्रदूषित पानी कहीं और नहीं छोड़ा जाएगा।

 

 

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फैक्ट्रियों को राहत, गांव वालों के हिस्से में प्रदूषण का खतरा?

 

गंवार ब्राह्मणान में रंगाई-छपाई इकाइयों के संचालन को लेकर सबसे बड़ी चिंता गांव के लोगों के पर्यावरण और जीवन पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की है। यदि फैक्ट्रियों को संचालन की अनुमति दी जाती है, तो उसके साथ प्रदूषित पानी के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था भी उतनी ही ठोस होनी चाहिए। त्योहार के नाम पर राहत देने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पर्यावरणीय सुरक्षा की शर्तें कमजोर पड़ जाएं। दीपावली खुशियों, रोशनी और उत्सव का पर्व है। लेकिन यदि गांव में प्रदूषित पानी के निस्तारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, तो ग्रामीणों की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फैक्ट्री संचालकों को कारोबार करने का अवसर मिलना चाहिए, मगर इसकी कीमत गांव के पर्यावरण और आम लोगों की सेहत को जोखिम में डालकर नहीं चुकाई जा सकती। यहां सवाल किसी उद्योग को बंद कराने या किसी कारोबारी को निशाना बनाने का नहीं, बल्कि कानून के समान अनुपालन का है। यदि प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने फैक्ट्रियों को शर्तों के साथ राहत दी है, तो उन शर्तों का पालन भी पारदर्शी और सत्यापन योग्य होना चाहिए। अन्यथा कागजों पर बनाई गई व्यवस्था और जमीन पर प्रदूषण की वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर बना रह सकता है।

 

SEPD डायरेक्टर प्रवीण शाह के जवाब ने खड़े किए नए सवाल

 

इस मामले में जब SEPD के डायरेक्टर प्रवीण शाह से पूछा गया कि गंवार ब्राह्मणान की फैक्ट्रियों के लिए रोटेशनल क्लोजर प्लान में अपशिष्ट पानी के निस्तारण से संबंधित व्यवस्था स्पष्ट रूप से किस तरह निर्धारित की गई है, तो उन्होंने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण मंडल से नियम-कायदे आने पर उन्हें साझा कर दिया जाएगा। जब उनसे पूछा गया कि गांव में वर्तमान में चल रही फैक्ट्रियां पहले की तरह ही संचालित हो रही है या उनके कामकाज में कोई बदलाव किया गया है, तो उन्होंने कहा कि इस संबंध में प्रदूषण नियंत्रण मंडल से ही जानकारी लेनी पड़ेगी। उन्होंने यह भी कहा कि मंडल से जो दिशा-निर्देश आएंगे, उसी के बाद इस बारे में बताया जा सकेगा। डायरेक्टर के ये जवाब कई अहम सवाल भी खड़े करते हैं। यदि मैनेजमेंट को प्रदूषण नियंत्रण मंडल के स्पष्ट दिशा-निर्देशों का इंतजार था, तो फिर गंवार ब्राह्मणान की 134 फैक्ट्रियों को रोटेशनल क्लोजर प्लान के तहत शामिल करते हुए जारी किए गए निर्देशों का आधार क्या था? क्या इन इकाइयों के लिए पानी के उठाव, परिवहन, उपचार और अंतिम निस्तारण की कोई विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई थी? यदि हां, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? इन सवालों का जवाब SEPD मैनेजमेंट और प्रदूषण नियंत्रण मंडल, दोनों को देना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि राहत के साथ पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी किस तरह निभाई जा रही है।

 

 

एसईपीडी डायरेक्टर प्रवीण शाह से सीधे सवाल

 

पहला सवाल: जब आप कह रहे हैं कि प्रदूषण नियंत्रण मंडल से नियम-कायदे आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी, तो फिर मैनेजमेंट ने गंवार ब्राह्मणान की 134 फैक्ट्रियों को रोटेशनल क्लोजर प्लान के
एरिया नंबर-2 में शामिल करने के बाद जो दिशा-निर्देश जारी किए, उनका आधार क्या था?

दूसरा सवाल: क्या इन 134 फैक्ट्रियों के अपशिष्ट पानी की कुल दैनिक मात्रा का कोई आकलन किया गया है? यदि हां, तो उसे उठाने के लिए कितने टैंकरों की आवश्यकता होगी और वर्तमान में कितने टैंकर उपलब्ध हैं?

तीसरा सवाल: जब ये फैक्ट्रियां मुख्य CETP प्लांट से जुड़ी नहीं हैं, तो इनके पानी के परिवहन और निस्तारण की जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या प्रत्येक इकाई को अलग से व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं?

चौथा सवाल: क्या SEPD मैनेजमेंट ने यह सुनिश्चित किया है कि टैंकरों से CETP पहुंचने वाले पानी का रिकॉर्ड रखा जाएगा और उसके वास्तविक उपचार की पुष्टि होगी? क्या इसके लिए कोई लिखित व्यवस्था बनाई गई है?

पांचवां सवाल: यदि पर्याप्त टैंकर उपलब्ध नहीं हैं, तो शेष अपशिष्ट पानी का क्या होगा? क्या फैक्ट्रियों को तब तक संचालन से रोका जाएगा, जब तक पानी के सुरक्षित निस्तारण की व्यावहारिक व्यवस्था नहीं हो जाती?

छठा सवाल: CETP के चैंबरों से मोटर के जरिए नेवटा फीडर में प्रदूषित पानी छोड़े जाने के आरोपों की जांच कराई गई है या नहीं? यदि जांच हुई है, तो उसका निष्कर्ष क्या है?

सातवां सवाल: क्या प्रदूषण नियंत्रण मंडल की लिखित अनुमति, निर्धारित शर्तें और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जा सकती है, ताकि ग्रामीणों को भी पता चले कि उनकी सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं?

 

 

 

 

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नियमों की स्पष्टता के बिना राहत, निगरानी के बिना कैसे होगी पालना ?

 

गंवार ब्राह्मणान का पूरा मामला अब एक बुनियादी सवाल पर आकर टिक गया है- क्या 134 फैक्ट्रियों के लिए बनाई गई व्यवस्था प्रदूषण रोकने में वास्तव में सक्षम है या यह केवल कागजी निर्देशों तक सीमित है? यदि फैक्ट्रियों से निकलने वाले पानी को CETP तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त टैंकर नहीं हैं, यदि परिवहन और उपचार की निगरानी स्पष्ट नहीं है और यदि अंतिम निस्तारण को लेकर भी सवाल कायम है, तो केवल रोटेशनल क्लोजर प्लान में नाम शामिल कर देना समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता। प्रदूषण नियंत्रण मंडल को राहत की शर्तों और उनके कानूनी आधार को स्पष्ट करना चाहिए। SEPD मैनेजमेंट को भी बताना चाहिए कि उसने 134 फैक्ट्रियों के लिए कौन-सी व्यावहारिक व्यवस्था बनाई है और उसका पालन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा। साथ ही, गांव में स्वतंत्र निरीक्षण कर यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि कहीं भी अनुपचारित अपशिष्ट पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। आखिरकार, दीपावली मनाने का हक फैक्ट्री मालिकों को भी है और गंवार ब्राह्मणान के ग्रामीणों को भी। लेकिन कारोबार की सुविधा के नाम पर पर्यावरणीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। फैक्ट्रियों को राहत तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ प्रदूषित पानी के सुरक्षित निस्तारण की ठोस व्यवस्था, पारदर्शी निगरानी और नियमों का सख्त पालन भी सुनिश्चित हो।

 

ऐसी ही खबरों के लिए देखें: DemocraticBharat.Com

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