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सुप्रीम कोर्ट में टली सुनवाई, SEPD मैनेजमेंट की लापरवाही से रोजी-रोटी के संकट में फंसा सांगानेरी प्रिंटिंग उद्योग

– सांगानेर कपड़ा रंगाई-छपाई उद्योग पर मंडराए संकट के बादल, सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 26 अक्टूबर; SEPD मैनेजमेंट की लापरवाही, सजा भुगत रहे फैक्ट्री मालिक

 

जयपुर। जयपुर के विश्व प्रसिद्ध सांगानेर कपड़ा रंगाई-छपाई उद्योग पर एक बार फिर अस्तित्व का बड़ा संकट मंडरा गया है। जोजरी-बांडी और लूनी नदी प्रदूषण मामले से जुड़ी विशेष अनुमति याचिका (SLP)पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद सांगानेरी प्रिंटिंग व्यवसायियों को तगड़ा झटका लगा है। सांगानेर की हजारों रंगाई-छपाई फैक्ट्रियों से जुड़ा यह मामला अब टल गया है और सुप्रीम कोर्ट में इस पर अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को होगी। सुप्रीम कोर्ट की इस तारीख के आगे बढ़ने से स्थानीय फैक्ट्री संचालकों के सामने रोजी-रोटी और कारोबार का बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया है। सांगानेर कपड़ा रंगाई-छपाई एसोसिएशन ने कोर्ट में ठोस पक्ष रखने और नियमों की पालना दर्शाने के उद्देश्य से 30 सितम्बर तक स्वैच्छिक बंदी (सेल्फ क्लोजर) ले रखा था। एसोसिएशन ने तो अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए फैक्ट्रियां बंद रखीं, लेकिन CETP (कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) का जिम्मा संभालने वाली SEPD/SPV की घोर लापरवाही और वादाखिलाफी ने पूरे उद्योग को गर्त में धकेल दिया है।

 

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16 सितम्बर की मीटिंग और ज्वॉइंट एक्शन प्लान हुआ फुस्स

मामले की गंभीरता को देखते हुए 16 सितम्बर को राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल (RPCB) मुख्यालय में सांगानेर कपड़ा रंगाई-छपाई एसोसिएशन और SEPD/SPV के बीच एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में एक ज्वॉइंट एक्शन प्लान तैयार किया गया था, जिसमें दोनों पक्षों की समयबद्ध जिम्मेदारियां तय की गई थीं:

एसोसिएशन का काम: 16 सितम्बर से 30 सितम्बर तक सभी फैक्ट्रियों को स्वैच्छिक रूप से बंद रखना। एसोसिएशन ने अपने इस वायदे को 100% पूरा किया।

SEPD/SPV की नाकामी:

एक्सपर्ट एजेंसी का चयन (16 से 19 सितम्बर): CETP प्लांट को दुरुस्त करने के लिए किसी विशेषज्ञ एजेंसी को लाने की डेडलाइन तय की गई थी, जो पूरी तरह फेल साबित हुई।

एमओयू (19 से 30 सितम्बर): चुनी गई एजेंसी से फाइनल एमओयू साइन होना था, जिस पर कोई काम नहीं हुआ।

134 फैक्ट्रियों को जोड़ना (16 से 30 सितम्बर): ब्राह्मणों की गंवार क्षेत्र की 134 छूटी हुई फैक्ट्रियों को जोड़ने के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) से अनुमति लेने का जिम्मा SEPD को दिया गया था, जिसमें भी मैनेजमेंट पूरी तरह नाकाम रहा।

 

12.3 MLD क्षमता का CETP सफेद हाथी साबित; 1-2 MLD पर सिमटा

मीटिंग में CETP प्लांट की कड़वी सच्चाई भी सामने आई। सांगानेर CETP की कुल क्षमता 12.3 MLD है, लेकिन ZLD (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज) सेक्शन अधूरा होने के कारण यह महज 1 से 2 MLD पर रेंग रहा है। प्लांट की MVR, RO और TMF जैसी मुख्य मशीनें खराब पड़ी हैं। एसोसिएशन की कुल 892 रजिस्टर्ड इकाइयों में से सिर्फ 758 इकाइयां ही इस प्लांट से जुड़ी हैं। शेष 134 इकाइयां ब्राह्मणों की गंवार क्षेत्र की हैं, जो आज भी अनकनेक्टेड हैं। PS-III पम्पिंग स्टेशन का सिविल काम तो पूरा हो चुका है, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के भारी विरोध के कारण पाइप लाइन बिछाने का काम अधर में अटका हुआ है।

 

 

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बड़ा खुलासा: SEPD डायरेक्टर प्रवीण शाह की खुद की फैक्ट्री अनकनेक्टेड

 

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला और गंभीर खुलासा यह हुआ है कि SEPD (सांगानेर एनवायर्नमेंट प्रोटेक्शन डेवलपमेंट) के जिस डायरेक्टर प्रवीण शाह के कंधों पर पूरे CETP प्लांट के संचालन और प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी है, उनकी खुद की प्रिंटिंग फैक्ट्री भी इस CETP प्लांट से नहीं जुड़ी हुई है। डायरेक्टर प्रवीण शाह की फैक्ट्री का जहरीला केमिकल युक्त पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के खुलेआम ब्राह्मणों की गंवार गांव में बहाया जा रहा है। इससे ग्रामीणों का जीना दूभर हो गया है और गांव नरक में तब्दील हो चुका है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि जब उन्होंने इस जहरीले पानी और प्रदूषण की शिकायत प्रवीण शाह से की, तो उन्होंने कोई समाधान करने के बजाय ग्रामीणों को सरेआम धमकाया-“जो करना है कर लो, मेरी पहुंच ऊपर तक है।”

 

मानवाधिकारों की उड़ रही धज्जियां

 

एक जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति खुद पर्यावरण और मानवाधिकार कानूनों की धज्जियां उड़ा रहा है। यह अब जांच का गंभीर विषय है कि प्रवीण शाह आखिर किस ‘ऊपर की पहुंच’ और रसूख के बल पर ग्रामीणों के स्वास्थ्य और जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं।

 

पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की भूमिका पर उठे तीखे सवाल

 

मामले का दूसरा स्याह पहलू यह है कि सांगानेर की जिन छोटी और आम प्रिंटिंग फैक्ट्रियों को CETP से जोड़ने के लिए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल की कार्रवाई का डर दिखाया जाता रहा, उसी पॉल्यूशन बोर्ड ने SEPD डायरेक्टर की फैक्ट्री पर आज तक आंखें क्यों मूंद रखी हैं?

दोहरा रवैया क्यों? जब CETP से जुड़ी अन्य फैक्ट्रियों पर गाज गिराई जा रही थी, तो प्रवीण शाह की अनकनेक्टेड फैक्ट्री को पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने कार्रवाई से बाहर क्यों रखा?

उपदेश बनाम जमीनी हकीकत: जो डायरेक्टर खुद अपनी फैक्ट्री का पानी ट्रीट नहीं कर पा रहे और पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, वे दूसरे फैक्ट्री मालिकों को प्रदूषण नियंत्रण का ज्ञान देने के नैतिक हकदार कैसे हो सकते हैं?

अब और गहराया संकट

SEPD मैनेजमेंट की इस आपराधिक लापरवाही और धोखाधड़ी के कारण आज सांगानेर का पूरा कपड़ा उद्योग फिर से अधर में लटक गया है। एसोसिएशन ने तो नियमों का पालन करते हुए अपनी फैक्ट्रियां बंद रखीं, लेकिन SEPD के वादे पूरे न होने और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टलने से हजारों मजदूरों और उद्योगपतियों के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन और राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल इस मामले में निष्पक्ष जांच बैठाकर SEPD मैनेजमेंट की जवाबदेही तय करते हैं या सांगानेर का विश्वप्रसिद्ध रंगाई-छपाई उद्योग यूं ही अपनों की ही वादाखिलाफी का शिकार होता रहेगा।

ऐसी ही खबरों के लिए देखते रहेः DemocraticBharat.Com

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