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बुद्ध पूर्णिमा पर ‘जंगल का महाकाउंट’: 24 घंटे में गिने जाएंगे बाघ-लेपर्ड, 2685 वाटर होल्स पर तैनात टीम

जयपुर। प्रदेश के जंगलों में इन दिनों एक खास ‘ऑपरेशन’ चल रहा है—वन्यजीवों की गिनती का महाअभियान। हर साल की तरह इस बार भी ग्रीष्म ऋतु में बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर वाटर होल पद्धति से वन्यजीवों की गणना शुरू हो गई है। यह कवायद 1 मई शाम 5 बजे से शुरू होकर 2 मई शाम 5 बजे तक लगातार 24 घंटे चलेगी। इस दौरान बाघ, बघेरा (लेपर्ड) समेत सभी प्रमुख वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज की जाएगी।

 

क्यों खास है यह गणना?

अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन प्रतिपालक के.सी. अरुण प्रसाद के मुताबिक, इस गणना का उद्देश्य सिर्फ संख्या जुटाना नहीं, बल्कि भविष्य की संरक्षण रणनीति को मजबूत करना है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किन इलाकों में वन्यजीवों की संख्या बढ़ रही है और कहां अतिरिक्त सुरक्षा या संसाधनों की जरूरत है।

 

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2685 वाटर होल्स पर ‘नजर’

इस बार प्रदेशभर में 2685 वाटर होल्स को चिन्हित किया गया है, जहां पानी की तलाश में आने वाले जानवरों का आंकलन किया जाएगा। संभागवार आंकड़े कुछ यूं हैं—

जयपुर      421
अजमेर     236
भरतपुर    191
उदयपुर    744
बीकानेर   262
कोटा        345
जोधपुर     482

इन जल स्रोतों के आसपास मचान (हाइड) बनाकर वनकर्मी, वॉलंटियर्स और वन्यजीव प्रेमी चौबीसों घंटे नजर रखे हुए हैं।

 

कैमरा ट्रैप से ‘गुप्त निगरानी’

सिर्फ मानवीय निगरानी ही नहीं, बल्कि हर संरक्षित क्षेत्र में कम से कम 10 जगहों पर कैमरा ट्रैप भी लगाए गए हैं। ये कैमरे चुपचाप आने-जाने वाले जानवरों की तस्वीरें कैद कर उनकी पहचान और संख्या तय करने में मदद करेंगे—खासतौर पर बाघ और लेपर्ड जैसे मायावी जीवों के लिए।

 

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बड़ी टीम, बड़ा मिशन

इस अभियान में वन विभाग का प्रशिक्षित स्टाफ, चयनित वॉलंटियर्स और गैर-सरकारी संगठनों के सदस्य जुटे हैं। बीट-वार गणना के लिए पूरे सिस्टम को माइक्रो लेवल पर बांटा गया है, जबकि उप वन संरक्षक, सहायक वन संरक्षक और क्षेत्रीय अधिकारी लगातार निगरानी कर रहे हैं।

 

संरक्षण की दिशा में अहम कदम

विशेषज्ञ मानते हैं कि गर्मियों में पानी के स्रोत सीमित होने के कारण वन्यजीव निश्चित स्थानों पर आते हैं, जिससे उनकी गिनती अपेक्षाकृत सटीक होती है। यही वजह है कि वाटर होल पद्धति को सबसे प्रभावी माना जाता है। कुल मिलाकर, यह 24 घंटे का ‘जंगल सर्वे’ सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि राजस्थान के वन्यजीवों के भविष्य की दिशा तय करने वाला अहम कदम है।

 

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