-शीतला अष्टमी का पर्व धार्मिक आस्था का प्रतीक और हमारे स्वास्थ्य व बदलते मौसम के साथ तालमेल बिठाने का एक वैज्ञानिक आधार भी है
शीतला अष्टमी जिसे उत्तर भारत में ‘बसौड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के त्योहारों में से एक है। माना जाता है कि इस दिन माता शीतला की पूजा करने से चेचक, खसरा और त्वचा से संबंधित रोगों से छुटकारा मिलता है और बच्चों पर माता अपना आशीर्वाद बनाए रखती हैं। ‘बसौड़ा’ हर साल चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी होली के आठ दिन बाद आता है। आमतौर पर यह पर्व मार्च या अप्रैल के महीने में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल शीतला अष्टमी का व्रत बुधवार, 11 मार्च को रखा जाएगा। कहते हैं कि इस दिन देवी की आराधना करने से सभी प्रकार के रोग-दोष से मुक्ति मिलती है। इसलिए माता शीतला की पूजा कर उन्हें बासी चीजों का भोग लगा प्रसन्न किया जाता है। मान्यता है कि माता शीतला बच्चों की रक्षा करती हैं और महिलाएं अपने बच्चों की लंबी आयु के लिए व्रत भी रखती हैं।
रक्षा कवच और मोहक स्वरूप वाली है माता

शीतला माता का स्वरूप बेहद मोहक और कल्याणकारी है। वे गर्दभ यानी गधे पर सवार रहती हैं, उनके एक हाथ में झाड़ू (सफाई का प्रतीक) और दूसरे हाथ में कलश (स्वास्थ्य का प्रतीक) होता है। इसके अलावा सिर पर नीम के पत्तों का मुकुट (औषधीय गुणों लिए) धारण किए हुए हैं, ये सभी इस बात का प्रतीक है कि साफ-सफाई ही निरोगी रहने की चाबी है।
आखिर बासी खाने का भोग ही क्यों?
धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं की मानें, शीतला अष्टमी पर बासी खाना खाने की परंपरा है। ‘बसौड़ा’ यानी ‘बासी भोजन’, ऐसे में इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। कारण, माता शीतला को शीतलता की देवी माना जाता है और उन्हें गर्म चीजें अप्रिय हैं। इसलिए सप्तमी की रात को ही तैयार किया गया ठंडा भोजन (दही, चावल, रबड़ी, हलवा और पूड़ी) उन्हें भोग में चढ़ाया जाता है। माता शीतला को बासी खाने का भोग लगाकर स्वयं भी बासी खाना ही प्रसाद स्वरूप खाना चाहिए। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर देखें तो यह दिन ठंड के खत्म होने और गर्मी के शुरू होने का संकेत देता है। बदलते मौसम में बीमारियों का खतरा होने से खाना जल्दी खराब होने लगता है। इसलिए यह परंपरा हमें ठंडी चीजों के सेवन और साफ-सफाई के प्रति सचेत करती है।
यह भी देखें: सीएम ने लाडनूं में जैन विश्व भारती के सुधर्मा सभा प्रवचन हॉल का किया लोकार्पण
कब है बसौड़ा 2026?
देश के अलग अलग भागों में शीतला माता की पूजा होती है। बता दें कि बसौड़ा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में मनाया जाता है। शीतला अष्टमी का पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है, जो इस बार 11 मार्च को है। सर्दी की समाप्ति और गर्मी के आरंभ का प्रतीक है बसौड़ा। गर्मी के शुरू होने से त्वचा रोग होने का खतरा बढ़ जाता है इसलिए उनसे रक्षा करने के लिए माता शीतला की पूजा की जाती है। विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए यह पूजा की जाती है।
जानें पूजा विधि के बारे में
संतान की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं। पूजा की इन विधियों का ध्यान रख शीतला माता को करें प्रसन्न।
-अष्टमी से एक दिन पहले शाम को रसोई घर की अच्छी तरह करें साफ-सफाई।
-दही, रबड़ी, मीठे चावल, पुए और पूड़ी भोग के लिए करें तैयार।
-ध्यान रहें कि अष्टमी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर ठंडे पानी से स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
-पूजा की थाली में बासी भोजन, पानी से भरा कलश, रोली, अक्षत (कच्चे चावल), हल्दी, काजल, मूंग की दाल के साथ दक्षिणा जरूर रखें।
-शीतला माता के मंदिर जाकर माता को रोली और हल्दी का तिलक लगाएं और साथ ही उन्हें काजल और वस्त्र (मौली) और बासी भोजन भोग स्वरूप अर्पित करें।
-इसके बाद शीतला माता की व्रत कथा का पाठ करें क्योंकि बिना कथा के यह पूजा अधूरी मानी जाती है।
-पूजा के बाद थोड़ा जल बचाकर घर लाएं और उसे पूरे घर में छिड़कें। ऐसा माना जाता है कि इससे घर की शुद्धि होती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
-अंत में घर के बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लें और परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद बांटें और खुद भी इसे ग्रहण करें।
ऐसी ही खबरों के लिए देखें: Democraticbharat.com






