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SMS में मेडिसिन विभाग पर ही डाल दिया OPD का बोझ, विशेषज्ञ डॉक्टर्स की फिर मौज

-एसएमएस अस्पताल में अब शाम को भी शुरू होगी ओपीडी, मेडिसिन विभाग के डॉक्टर्स ही देखेंगे सभी मरीजों को

जयपुर। मुख्य सचिव और चिकित्सा सचिव की लगातार मॉनिटरिंग के बाद आखिरकार प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एसएमएस प्रशासन ने मेडिसिन विभाग की सामान्य ओपीडी के साथ ही अब शाम की शिफ्ट में भी दो घंटे अतिरिक्त ओपीडी शुक्रवार से शुरू करने की घोषणा कर दी है। दावा किया जा रहा है कि इससे मरीजों को राहत मिलेगी। लेकिन, हकीकत इससे कोसों दूर है। असलियत यह है कि एसएमएस की इमरजेंसी में आने वाले हर मरीज (चाहे वह न्यूरोलॉजी, यूरोलॉजी, गेस्ट्रोलॉजी, नेफ्रोलॉजी या अन्य सुपरस्पेशियलिटी बीमारी से पीड़ित हो) को सबसे पहले मेडिसिन विभाग में ही भर्ती किया जाता है। यानी इमरजेंसी में किसी भी ‌विभाग का वास्तविक विशेषज्ञ ऑन कॉल मौजूद नहीं रहता है, ऐसे में इमरजेंसी में सिर्फ प्राथमिक उपचार ही मिल पाता है। ऐसे में सही डायग्नोसिस और विशेषज्ञ डॉक्टर से इलाज में देरी होती चली जाती है। इसका खमियाजा मरीज और उसके परिजन भुगतते हैं।

न्यूरोलॉजी के गंभीर मरीजों को भी मेडिसिन विभाग में कर रहे शिफ्ट

एसएमएस की इमरजेंसी में रोजाना बढ़ रहे नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी और गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी के मरीजों की संख्या के हिसाब से सुपरस्पेशियलिटी सेवाएं बेहद आवश्यक हैं। लेकिन विभागों की ओपीडी समय पर ना खुलना, इमरजेंसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों का गैरहाजिर और उच्चस्तरीय टेस्ट में देरी मरीजों की हालत और खराब कर रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि न्यूरोलॉजी के कई गंभीर मरीज भी विशेषज्ञ की गैरमौजूदगी में मेडिसन विभाग में ही शिफ्ट कर दिए जाते हैं, जबकि अस्पताल में न्यूरोलॉजी के पूर्ण स्टाफ उपलब्ध हैं।

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मेडिसन के बजाय सुपरस्पेशियलिटी विभागों की शुरू हो ओपीडी

एसएमएस अस्पताल से जुड़े जानकारों का कहना है कि सुपरस्पेशियलिटी विभागों की अलग से ओपीडी खोली जाती, जिससे मरीजों को समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा मिल पाती। इसके लिए सभी सुपरस्पेशियलिटी विभागों की नियमित और अनिवार्य ओपीडी शुरू की जाए। इमरजेंसी में न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी के वरिष्ठ रेजिडेंट और फैकल्टी की उपस्थिति अनिवार्य की जाए। निजी पर्ची के जरिए घर से होने वाली सीधी भर्ती पर तत्काल सख्त रोक लगानी चाहिए। ऐसा करने से मरीजों को वास्तविकता में राहत मिलती। वहीं अब ऐसा ना करके प्रशासन ने फिर से बोझ मेडिसिन विभाग पर ही डाल दिया है। इमरजेंसी में आने वाला हर मरीज मेडिसिन में ही भर्ती हो रहा है। ऐसे में शाम की ओपीडी से मरीजों को पूरी राहत मिलेगी, इस पर संशय है।

निजी पर्ची की “शॉर्टकट भर्ती”, गरीब मरीजों के साथ अन्याय

चिंताजनक बात यह भी है कि इमरजेंसी में मरीज को सीधे संबंधित विभाग में भर्ती ना करके मेडिसन में भेज दिया जाता है। बाद में मरीज को रेफरेंस सिस्टम के भरोसे छोड़ दिया जाता है। ऐसी स्थिति मरीजों और उनके  परिजनों के लिए और भी बड़ा संकट बन गया है। मरीज के परिजन घंटों डॉक्टरों के कमरे, विभागीय दफ्तर और काउंटरों के चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन समाधान लेटलतीफ ही मिलता है। इस दौरान गंभीर मरीज की हालत और बिगड़ जाती है। इसके उलट, यदि यही मरीज किसी विभागीय डॉक्टर के घर चल रही निजी ओपीडी में जाकर दिखाए और वहां से पर्ची बनवा ले, तो अस्पताल में उसे सीधे संबंधित विभाग के वार्ड में भर्ती कर दिया जाता है। यह दोहरी व्यवस्था न सिर्फ अस्पताल की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है बल्कि आर्थिक रूप से भी कमजोर मरीजों के लिए भारी अन्याय है।

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